शेंडा छंटाई क्यों जरूरी है?
तूर के पौधों में 'एपिकल डोमिनेंस' (Apical Dominance) नामक गुण होता है। पौधे का शीर्ष भाग 'ऑक्सिन' (Auxin Hormone) हार्मोन उत्पन्न करता है, जो पार्श्व शाखाओं (Lateral Buds) की वृद्धि को रोकता है। नतीजतन, पौधा ऊंचाई में तो बढ़ता है, लेकिन शाखाओं की संख्या सीमित रहती है।
जब शीर्ष भाग को काटा जाता है, तो यह डोमिनेंस टूटता है, जिससे पार्श्व कली सक्रिय होकर नई शाखाएं बनाती हैं। इससे पौधा झाड़ीदार और गोलाकार बनता है, फूलों और फलियों की संख्या बढ़ती है, और अंततः उपज में वृद्धि होती है।
सही समय और तकनीक
कई किसान 30, 60, या 90 दिनों के अंतराल पर बार-बार छंटाई करते हैं, लेकिन यह गलत है। महात्मा फुले कृषि विश्वविद्यालय (राहुरी), डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषि विश्वविद्यालय (अकोला), और तेलंगाना के वारंगल अनुसंधान केंद्र के अध्ययनों के अनुसार:
-
छंटाई का सही समय : बुवाई के 45 दिन बाद केवल एक बार छंटाई करें।
-
बार-बार छंटाई न करें : इससे उत्पादन नहीं बढ़ता, बल्कि खेती की लागत बढ़ती है।
छंटाई से कितना लाभ?
यदि सही समय (45वें दिन) पर छंटाई की जाए, तो:
-
फल देने वाली शाखाओं की संख्या में 18-20% की वृद्धि होती है।
-
कुल उपज में 15-20% की बढ़ोतरी दर्ज की जाती है।
-
प्रति एकड़ 1 से 1.5 क्विंटल अतिरिक्त उत्पादन प्राप्त होता है।
-
बाजार मूल्य के आधार पर किसानों को आर्थिक लाभ मिलता है।
छंटाई करते समय सावधानियां
-
पौधे के शीर्ष 3-4 इंच हिस्से को हल्के हाथों से या दरांती से काटें।
-
मशीन (जैसे ब्रश कटर) का उपयोग करने से पौधा घायल हो सकता है। ऐसी स्थिति में, कटाई के बाद 10 ग्राम बाविस्टिन को 10 लीटर पानी में मिलाकर फफूंदनाशक की फवारनी करें।
किसानों का अनुभव
परभणी के एक प्रगतिशील किसान ने बताया, "पहले हम छंटाई नहीं करते थे, तब प्रति एकड़ 6-7 क्विंटल उपज मिलती थी। लेकिन 45वें दिन छंटाई शुरू करने के बाद अब 10-12 क्विंटल तक उपज मिल रही है। अधिक शाखाओं के कारण फलियां बढ़ीं, और आय में काफी वृद्धि हुई।"
निष्कर्ष
तूर की शेंडा छंटाई एक सरल और कम लागत वाली तकनीक है, जो सही समय पर लागू करने से:
-
15-20% अधिक उपज देती है।
-
प्रति एकड़ 1-1.5 क्विंटल अतिरिक्त उत्पादन सुनिश्चित करती है।
-
किसानों की आय बढ़ाती है।
खरीफ हंगाम 2025 में इस वैज्ञानिक तकनीक को अपनाकर तूर का रिकॉर्ड उत्पादन प्राप्त करें। अधिक जानकारी के लिए अपने नजदीकी कृषि विश्वविद्यालय या कृषि केंद्र से संपर्क करें।