रेबीज क्या है? (What is rabies?)
रेबीज एक विषाणुजन्य और 100% घातक बीमारी है, जिसका कोई इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसे पूर्ण रूप से रोका जा सकता है। यह बीमारी ‘रैब्डो वायरस’ के कारण होती है, जो मुख्य रूप से कुत्तों के काटने से फैलती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ( WHO ) के अनुसार, हर साल वैश्विक स्तर पर लगभग 59,000 लोग रेबीज के कारण अपनी जान गंवाते हैं, जिनमें से 95% मामले एशिया और अफ्रीका में होते हैं। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 20,000 लोग इस बीमारी का शिकार बनते हैं, जिसमें 40% मामले 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में देखे जाते हैं।
विश्व रेबीज दिवस का महत्व
हर साल 28 सितंबर को ‘विश्व रेबीज दिवस’ मनाया जाता है। इस दिन को फ्रांसीसी सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक डॉ. लुईस पाश्चर की पुण्यतिथि के अवसर पर चुना गया, जिन्होंने रेबीज की प्रतिबंधात्मक वैक्सीन का आविष्कार किया था। वर्ष 2007 से ग्लोबल अलायंस फॉर रेबीज कंट्रोल इस दिन को जागरूकता बढ़ाने के लिए आयोजित करता है।
वर्ष 2025 में 19वें विश्व रेबीज दिवस की थीम है - ‘अभी कार्रवाई करें: आप, मैं और समुदाय’ । यह थीम व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर रेबीज उन्मूलन के लिए तत्काल कार्रवाई पर जोर देती है। इसका उद्देश्य कुत्तों के माध्यम से फैलने वाली इस बीमारी को नियंत्रित करना और मानव जीवन को बचाना है।
रेबीज का प्रसार और प्रभाव
रेबीज एक जूनोटिक रोग है, जो गर्म रक्त वाले प्राणियों जैसे कुत्ते, बिल्ली, लोमड़ी, चमगादड़, और बंदरों में फैलता है। यह मुख्य रूप से बाधित पशु के काटने या उसकी लार के संपर्क में आने से फैलता है। विश्व में रेबीज के 99% मामले कुत्तों के काटने से होते हैं।
रेबीज के प्रमुख तथ्य:
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वैश्विक प्रभाव : हर साल 59,000 लोग रेबीज से मरते हैं, जिनमें से 95% मामले एशिया और अफ्रीका में।
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भारत में स्थिति : भारत में विश्व के 36% रेबीज मृत्यु होते हैं, यानी लगभग 20,000 मामले प्रतिवर्ष।
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बच्चों पर प्रभाव : 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में कुत्ते के काटने की घटनाएं 40% अधिक होती हैं।
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प्रतिबंधात्मक उपाय : रेबीज 100% रोका जा सकता है, लेकिन एक बार लक्षण दिखने पर इसका कोई इलाज नहीं है।
रेबीज के लक्षण
रेबीज के लक्षण प्राणी और इंसानों में अलग-अलग समय पर दिखाई देते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि काटा गया स्थान शरीर के किस हिस्से में है। सिर के पास काटने पर लक्षण जल्दी दिखते हैं, जबकि पैरों में काटने पर देरी हो सकती है।
कुत्तों में लक्षण:
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अत्यधिक लार टपकना।
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मालिक को न पहचानना या आज्ञा न मानना।
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आक्रामक व्यवहार और काटने की प्रवृत्ति।
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पानी से डर (हाइड्रोफोबिया)।
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आवाज बंद होना और जबड़ा लटकना।
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आमतौर पर 3-7 दिनों में मृत्यु।
गायों, भैंसों में लक्षण:
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आक्रामकता और इंसानों पर हमला करना।
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सिर को पेड़ या दीवार पर रगड़ना।
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अत्यधिक लार और लाल आंखें।
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बार-बार मल-मूत्र त्याग।
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2-3 दिनों में मृत्यु।
मनुष्यों में लक्षण:
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तीव्र सिरदर्द और थकान।
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पानी और भोजन से डर।
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अत्यधिक संवेदनशीलता और बेचैनी।
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नाक-आंखों से पानी बहना।
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लकवा और 7 दिनों में मृत्यु।
रेबीज का निदान
जीवित प्राणी या मनुष्य में रेबीज की कोई विशेष जांच उपलब्ध नहीं है। निदान लक्षणों और इतिहास के आधार पर किया जाता है। यदि कुत्ता काटने के 4-10 दिनों में मर जाता है, तो यह रेबीज का संकेत हो सकता है। मृत पशु के मस्तिष्क की प्रयोगशाला जांच से पक्का निदान संभव है।
रेबीज से बचाव के उपाय
रेबीज को रोकने के लिए तत्काल और सही कदम उठाना जरूरी है। निम्नलिखित उपाय प्रभावी हैं:
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जख्म की सफाई : कुत्ते के काटने के तुरंत बाद जख्म को कम से कम 15 मिनट तक साबुन और पानी से धोएं। इसके बाद अल्कोहल या पोविडोन आयोडीन जैसे कीटाणुनाशक लगाएं। जख्म पर टांके या पट्टी न बांधें।
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लसीकरण : रेबीज वैक्सीन का कोर्स तुरंत शुरू करें। यह 0, 3, 7, 14 और 28वें दिन इंजेक्शन के रूप में दिया जाता है। यदि देरी हो, तो जल्द से जल्द वैक्सीन शुरू करें।
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कुत्तों का टीकाकरण : कुत्तों को 3 महीने की उम्र में पहली रेबीज वैक्सीन और फिर हर साल बूस्टर डोज देना जरूरी है।
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उच्च जोखिम वाले समूह : पशु चिकित्सक, रेबीज शोधकर्ता, और पशु संभालने वालों को नियमित रूप से प्रतिबंधात्मक वैक्सीन लेनी चाहिए।
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सावधानी : भटके कुत्तों से सावधान रहें। उनकी शारीरिक भाषा समझें और उत्तेजित करने से बचें।
सामुदायिक स्तर पर रेबीज नियंत्रण
रेबीज को नियंत्रित करने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। सरकार, गैर-सरकारी संगठन, और समुदाय मिलकर निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं:
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भटके कुत्तों की आबादी नियंत्रित करने के लिए नसबंदी अभियान।
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सामुदायिक स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम।
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स्कूलों में बच्चों को रेबीज और पशु व्यवहार के बारे में शिक्षा।
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पशुओं के लिए मुफ्त या सस्ती वैक्सीन उपलब्ध कराना।
भारत में रेबीज की स्थिति
भारत में रेबीज एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में भटके कुत्तों की बड़ी संख्या इस बीमारी के प्रसार का कारण है। सरकार और गैर-सरकारी संगठन विभिन्न जागरूकता और लसीकरण अभियान चला रहे हैं, लेकिन अभी भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का लक्ष्य 2030 तक रेबीज को पूरी तरह समाप्त करना है। भारत में इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सामूहिक प्रयास और जागरूकता जरूरी है।
निष्कर्ष
विश्व रेबीज दिवस 2025 हमें याद दिलाता है कि रेबीज एक घातक, लेकिन रोके जा सकने वाली बीमारी है। समय पर वैक्सीन, जागरूकता, और सामुदायिक सहयोग से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। कुत्तों के काटने के बाद तुरंत चिकित्सा सहायता लें और अपने पालतू पशुओं का नियमित टीकाकरण सुनिश्चित करें।
